"बिदेसिया" ने लोगों को किया भाव-विभोर - मधेपुरा खबर Madhepura Khabar

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24 दिसंबर 2025

"बिदेसिया" ने लोगों को किया भाव-विभोर

डेस्क: भिखारी ठाकुर सामाजिक शोध संस्थान के रँगजलसा 2025 के अंतर्गत जयंती समारोह के उपलक्ष्य में रंग उर्वशी फाउंडेशन आरा के कलाकारों कलाकारों ने देसी स्त्री की पीड़ा का बया कर दर्शकों को भाव-विभोर कर दिया. पति को परदेस जाने की पीड़ा एक स्त्री कैसे सहती है जिसे कलाकारों ने गीतों और संवाद के द्वारा दर्शकों को बांधे रखा. प्रस्तुति परिकल्पना अंबुज कुमार एवं नाट्य निर्देशन साधना श्रीवास्तव का था. नाट्य संयोजन चैतन्य निर्भय ने किया और साधना श्रीवास्तव के साथ साथ सह कलाकारों ने शानदार प्रस्तुति की और दर्शकों की वाहवाही बटोरी. नाटक में  साधना श्रीवास्तव (प्यारी धनिया), शालिनी श्रीवास्तव (सुंदरी), अनिल सिंह (सूत्रधार), बीरेंद्र ओझा (बटोही), चैतन्य निर्भय (विदेशी), सुंदरम (सूत्रधार), कुणाल (देवर), शगुन (बच्चा), संकल्प (बच्चा) ने जिवंत अभिनय किया. जबकि कुमार नरेंद्र, निराला जी (नाल),  अशोक, किशन, रतन (झाल), भगवती जी (पखावज), कमलेश व्यास, दीपाली, शेफाली, पूजा राज, सारिका, गुड़िया, आशीष ने अपने संगीत ने दर्शकों को और भी भाव विभोर कर दिया. भिखारी ठाकुर की शैली को कलाकारों ने बखूबी निभाया. गांव की गरीबी से तंग आकर लोग परदेस का रुख करते है. जहां पर एक ओर उनका घर-परिवार छूटता है तो दूसरी ओर मानवीय रिश्ते. बेहतर भविष्य के लिए होने वाले पलायन दरकते रिश्तों की एक टीस मन में छोड़ जाता है. बता दें कि नाटक की प्रस्तुति ने दर्शकों का दिल जीत लिया और सभी कलाकारों ने अपनी अदाकारी से सबको प्रभावित किया. भिखारी ठाकुर एक महान लोक कलाकार, नाटककार, गीतकार और समाज सुधारक थे. उन्हें भोजपुरी के शेक्सपियर कहा जाता है. उनके नाटकों में समाज की कुरीतियों और असमानता के खिलाफ आवाज उठाई गई है. ज्ञातव्य हो कि भिखारी ठाकुर का जन्म 18 दिसंबर 1887 को बिहार के सारण जिले के कुतुबपुर गांव में हुआ था. वह एक नाई परिवार से ताल्लुक रखते थे. उन्होंने अपने नाटकों में समाज की कुरीतियों और असमानता के खिलाफ आवाज उठाई. उनके नाटकों में "बिदेसिया", "भाई-बिरोध", "बेटी-बेचवा", "कलयुग प्रेम" आदि शामिल हैं. उन्हें 1944 में बिहार सरकार ने राय बहादुर की उपाधि से सम्मानित किया था.
ये थी कहानी : गांव के युवक की शादी सुंदर स्त्री से होती है. दोनों एक-दूसरे को प्रेम करते हैं. शादी और गौना के कुछ दिनों बाद युवक को बेरोजगारी का दंश सताता है. वह अपने परिवार का भविष्य संवारने के लिए शहर की ओर रूख करता है. युवक अपनी नई नवेली दुल्हन को छोड़कर परदेस जाता है. पति को परेदस जाने के बाद पत्‍‌नी पति के वियोग में दिन-रात जलती है. परदेस जाते ही युवक बिदेसिया हो जाता है. काफी दिनों तक पति का समाचार नहीं मिलने के कारण गांव से उसकी खबर लेने के लिए बटोही शहर जाता है. बटोही कोलकाता शहर में जाते ही बिदेसी को किसी और औरत के साथ देखता है. जिसके दो बच्चे भी है. बटोही बिदेसी को गांव में कष्ट झेल रही पत्‍‌नी के बारे में बताता है. बिदेसी को अपनी गलती का अहसास होता है और सब छोड़ कर गांव लौट आता है. कुछ दिन बात दूसरी महिला जो शहर में रहती है वह बिदेसी को खोजते हुए गांव आ जाती है. पूरी कहानी को समझने में पहली पत्‍‌नी को देर नहीं लगती, लेकिन पति की खुशी के लिए पत्‍‌नी दूसरी औरत को भी अपने घर में जगह देती है.
(रिपोर्ट:- सुनीत साना)
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